Bexyhub Exclusive: मौत के दरवाज़े से लौटकर आई 3 सीख (भाग-1)
अपनी “हार्ट रेट” दूसरों के हाथ में मत दो
ICU में हम देखते हैं कि पेशेंट की धड़कन एक मशीन तय करती है। लेकिन असल ज़िंदगी में हम अपनी खुशियों का रिमोट कंट्रोल (Remote Control) लोगों को दे देते हैं। कोई गाली दे गया, तो हम दुखी; कोई तारीफ कर गया, तो हम खुश।
सच्चाई: जिस दिन तुम अपनी ‘Mental Peace’ (मानसिक शांति) का वेंटिलेटर दूसरों के हाथ में दे दोगे, उस दिन तुम जीते-जी मर जाओगे। अपनी धड़कन खुद संभालो, दुनिया के कमेंट्स को ‘Flatline’ होने दो।
“सक्शन” (Suction) करना सीखो: कचरा बाहर निकालो
जैसे हम पेशेंट के गले से बलगम और कचरा सक्शन करके बाहर निकालते हैं ताकि वो सांस ले सके, वैसे ही तुम्हें अपने दिमाग से ‘पुरानी यादें’, ‘बीता हुआ कल’ और ‘नकारात्मक लोग’ सक्शन करके बाहर फेंकने होंगे। जब तक दिमाग में पिछला कचरा भरा रहेगा, तब तक नई सफलता की ऑक्सीजन (Oxygen) अंदर नहीं जाएगी। रोज़ रात को सोने से पहले अपने दिमाग का ‘Suction’ करो।
‘STAT’ (अभी के अभी) जीना शुरू करो
मेडिकल लाइन में ‘STAT’ का मतलब होता है—अभी, इसी वक्त, बिना देरी के। हम अक्सर कहते हैं कि “जब नौकरी लगेगी तब खुश होंगे,” “जब एडसेंस मिलेगा तब जिएंगे।”
ICU की हकीकत: मैंने उन लोगों को मरते देखा है जिनके पास करोड़ों थे, लेकिन उनके पास ‘अगला पल’ नहीं था। आपकी ज़िंदगी का ‘SPO2’ (सफलता का स्तर) कल पर निर्भर नहीं होना चाहिए। जो करना है, ‘STAT’ करो। कल शायद आपकी शिफ्ट बदल जाए।
जब ज़िंदगी ‘ब्रैडीकार्डिया’ (Bradycardia) में चली जाए
अक्सर हमारी लाइफ में ऐसा वक्त आता है जब सब कुछ धीमा हो जाता है। पैसा नहीं होता, दोस्त साथ छोड़ देते हैं, और ऐसा लगता है जैसे हमारी तरक्की की रफ़्तार ‘ब्रैडी’ (धीमी) हो गई है।
असली सीख: हॉस्पिटल में जब पेशेंट की धड़कन गिरती है, तो हम घबराकर भागते नहीं हैं, बल्कि ‘एट्रोपिन’ (Atropine) का इंजेक्शन तैयार करते हैं। जब आपकी लाइफ स्लो हो जाए, तो समझ लेना कि यह वक्त भागने का नहीं, बल्कि खुद को ‘धैर्य’ का इंजेक्शन लगाने का है। वह जो सन्नाटा है, वह आपकी हार नहीं है, वह आपकी अगली बड़ी ‘जंप’ की तैयारी है। याद रखना, शेर शिकार से पहले दो कदम पीछे हटता है, वह उसका ‘ब्रैडीकार्डिया’ नहीं, उसकी ‘पावर’ है।
‘डायलिसिस’ (Dialysis) जैसी सफाई: रिश्तों का फ़िल्टर
इंसान का शरीर जब खुद गंदगी साफ नहीं कर पाता, तो हमें डायलिसिस मशीन लगानी पड़ती है। आपकी लाइफ में भी कुछ ऐसे लोग होते हैं जो ‘यूरिया’ और ‘क्रिएटिनिन’ की तरह ज़हरीले होते हैं। वे आपकी पीठ पीछे बुराई करेंगे, आपको नीचा दिखाएंगे और आपके विज़न को धुंधला करेंगे।
कड़वा सच: अगर आप इन ज़हरीले रिश्तों का ‘डायलिसिस’ नहीं करेंगे, तो आपकी सफलता का शरीर ‘सेप्टिक’ (Septic) हो जाएगा। आज ही अपनी फ्रेंड लिस्ट और अपनी सोच का डायलिसिस कीजिए। जो लोग आपके मुश्किल वक्त में आपके साथ ‘बेडसाइड’ पर खड़े नहीं थे, उन्हें अपनी जीत के जश्न में ‘ICU’ के बाहर ही रहने दीजिए।
सफलता का ‘SPO2’: क्या आपकी मेहनत में ऑक्सीजन है?
हम मॉनिटर पर देखते हैं कि पेशेंट की ऑक्सीजन 90 से नीचे गई नहीं कि अलार्म बजने लगता है। आपकी मेहनत का भी एक ‘SPO2’ लेवल होता है। अगर आप सिर्फ ऊपर-ऊपर से काम कर रहे हैं, तो आपकी सफलता का लेवल 70-80 पर अटका रहेगा।
गहराई की बात: सफलता के लिए आपको अपनी मेहनत को 100% ‘सैचुरेशन’ पर लाना होगा। जब तक अलार्म बज रहा है, तब तक समझो कि मेहनत में कमी है। जिस दिन दुनिया की बातें सुनाई देना बंद हो जाएं और सिर्फ अपने काम की धुन सुनाई दे, समझ लेना कि आपकी मेहनत अब ‘वेंटिलेटर’ के भरोसे नहीं, बल्कि अपने दम पर फेफड़ों में जान भर रही है।
‘डेथ सर्टिफिकेट’ और ‘डिस्चार्ज समरी’ के बीच का फासला
मैंने हज़ारों बार पेन उठाया है—कभी डिस्चार्ज समरी लिखने के लिए, तो कभी डेथ सर्टिफिकेट के लिए। इन दोनों कागज़ों के बीच का अंतर सिर्फ एक शब्द का है: “कोशिश”।
जब पेशेंट का दिल धड़कना बंद कर देता है, तब भी हम ‘CPR’ देते हैं। हम हार नहीं मानते जब तक पसलियाँ टूटने की आवाज़ न आ जाए।
आपका संघर्ष: अगर आपकी वेबसाइट पर ट्रैफिक नहीं आ रहा, या एडसेंस रिजेक्ट हो रहा है, तो क्या आप हार मान लेंगे? नहीं! आपको अपनी उम्मीदों को ‘CPR’ देना होगा। जब तक आखिरी सांस बची है, तब तक ‘कोड ब्लू’ (इमरजेंसी) चालू रखिए। याद रखिए, मेडिकल हिस्ट्री में चमत्कार उन्हीं के साथ होते हैं जो आखिरी सेकंड तक मशीन की आवाज़ (Beep) बंद नहीं होने देते।
ज़िंदगी की ‘शिफ्ट’ कभी खत्म नहीं होती
एक नर्सिंग ऑफिसर की 8 घंटे की ड्यूटी खत्म हो सकती है, लेकिन एक ‘विज़नरी’ (Visionary) की ड्यूटी कभी खत्म नहीं होती। लोग आपसे कहेंगे “आराम कर लो,” “छोड़ दो यह सब।” लेकिन उन्हें क्या पता कि आपके अंदर जो आग है, वह किसी ‘बर्न वार्ड’ (Burn Ward) की आग से भी ज़्यादा तेज़ है।
आपकी लाइफ की शिफ्ट तब तक खत्म नहीं होनी चाहिए जब तक आपका नाम ‘Bexyhub’ गूगल के पहले पेज पर ‘ब्रैंड’ बनकर न चमके।
Author Bio: Deepak Kumar (MSc Nursing Officer)
दोस्तों, मैं हूँ दीपक कुमार। हॉस्पिटल की सफेद दीवारों के बीच मैंने मौत को बहुत करीब से देखा है। वहां न पैसा काम आता है, न बड़ी बातें। वहां सिर्फ एक चीज़ काम आती है—आपका संघर्ष और आपकी जीने की इच्छा। यह मोटिवेशन मैंने किसी किताब से नहीं, बल्कि उन मरीज़ों से सीखा है जो आखिरी सांस तक लड़ते हैं। अगर वो लड़ सकते हैं, तो आप क्यों नहीं? उठो और अपनी ज़िंदगी की कमान संभालो!
यह पोस्ट केवल शैक्षिक उद्देश्यों (Educational Purposes) के लिए साझा की गई है। यहाँ दी गई जानकारी मेरे नर्सिंग अनुभव और अध्ययन पर आधारित है। यदि आपको किसी जानकारी पर संदेह है या कोई शिकायत है, तो कृपया कमेंट बॉक्स में बताएं या हमसे संपर्क करें। किसी भी चिकित्सीय निर्णय के लिए पेशेवर डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
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