विज्ञान / Science
अध्याय 1: फसल उत्पादन एवं प्रबंध (Detailed Notes)
1. फसल किसे कहते हैं?
जब एक ही किस्म के पौधे किसी स्थान पर बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं, तो उसे फसल कहते हैं। जैसे—गेहूँ की फसल का अर्थ है कि खेत में उगाए गए सभी पौधे गेहूँ के हैं।
2. फसलों के प्रकार (ऋतु के आधार पर)
भारत एक विशाल देश है, यहाँ तापमान और वर्षा अलग-अलग होती है। इसलिए फसलों को दो भागों में बाँटा गया है:
खरीफ फसल: वह फसल जिसे वर्षा ऋतु (जून से सितंबर) में बोया जाता है। उदाहरण: धान, मक्का, सोयाबीन, मूँगफली, कपास आदि।
रबी फसल: वह फसल जिसे शीत ऋतु (अक्टूबर से मार्च) में उगाया जाता है। उदाहरण: गेहूँ, चना, मटर, सरसों तथा अलसी।
3. आधारित फसल पद्धतियाँ (7 मुख्य चरण)
किसान को फसल उगाने के लिए क्रमवार ये 7 काम करने पड़ते हैं:
i. मिट्टी तैयार करना: यह सबसे पहला कदम है। मिट्टी को पलटना और उसे पोला बनाना जरूरी है ताकि जड़ें जमीन में गहराई तक जा सकें। इसके लिए ‘हल’ या ट्रैक्टर से चलने वाले ‘कल्टीवेटर’ का प्रयोग होता है।
ii. बुआई: बीजों को मिट्टी में डालना। इससे पहले साफ और स्वस्थ बीजों का चयन किया जाता है। आधुनिक समय में ‘सीड ड्रिल’ मशीन से बुआई की जाती है जिससे बीज समान दूरी पर रहते हैं।
iii. खाद एवं उर्वरक मिलाना: मिट्टी में पोषक तत्वों को बढ़ाने के लिए खाद (जैविक) और उर्वरक (रासायनिक) मिलाए जाते हैं।
खाद: यह गोबर और पौधों के अवशेष से बनती है, जो मिट्टी को ‘ह्यूमस’ देती है।
उर्वरक: ये फैक्ट्रियों में बनते हैं जैसे यूरिया, पोटाश आदि।
iv. सिंचाई: निश्चित समय पर पौधों को पानी देना।
पारंपरिक तरीके: कुएँ, नदियाँ, नहरें।
आधुनिक तरीके: छिड़काव तंत्र (Sprinkler)—जहाँ पानी कम हो। ड्रिप तंत्र (Drip System)—पानी सीधा जड़ों में गिरता है, इसमें पानी बिल्कुल बर्बाद नहीं होता।
v. खरपतवार से सुरक्षा: खेत में फसल के साथ जो फालतू घास उग आती है, उसे ‘खरपतवार’ कहते हैं। इसे हटाने को ‘निराई’ कहते हैं। इसके लिए 2,4-D जैसे रसायनों का भी छिड़काव होता है।
vi. कटाई: फसल पकने पर उसे काटना। अनाज के दानों को भूसे से अलग करना ‘थ्रेसिंग’ कहलाता है। इसके लिए ‘कंबाइन’ मशीन का उपयोग होता है।
vii. भंडारण: ताजे अनाज को नमी, चूहों और कीटों से बचाकर रखना। बड़े स्तर पर अनाज को ‘साइलो’ (Silo) या धातु के बड़े पात्रों में रखा जाता है।
अध्याय 2: सूक्ष्मजीव: मित्र एवं शत्रु (Detailed Notes)
1. सूक्ष्मजीव क्या हैं?
ऐसे जीव जिन्हें हम नंगी आँखों से नहीं देख सकते और जिन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी (Microscope) की जरूरत पड़ती है, उन्हें सूक्ष्मजीव कहते हैं। ये हवा, पानी, मिट्टी और हमारे शरीर के अंदर भी होते हैं।
2. सूक्ष्मजीवों के प्रकार
इन्हें 4 मुख्य वर्गों में बाँटा गया है:
जीवाणु (Bacteria): जैसे—राइजोबियम।
कवक (Fungi): जैसे—ब्रेड पर लगने वाली फफूंद।
प्रोटोजोआ (Protozoa): जैसे—अमीबा।
शैवाल (Algae): जैसे—स्पाइरोगाइरा।
(विषाणु/Virus भी सूक्ष्म होते हैं लेकिन ये केवल किसी जीव के अंदर ही प्रजनन करते हैं)
3. हमारे मित्र सूक्ष्मजीव (उपयोग)
दही और ब्रेड: लैक्टोबैसिलस जीवाणु दूध को दही में बदलता है। यीस्ट का उपयोग ब्रेड और केक को फुलाने के लिए होता है।
व्यावसायिक उपयोग: सूक्ष्मजीवों से बड़े स्तर पर अल्कोहल और सिरका (S vinegar) बनाया जाता है।
टीका (Vaccine): एडवर्ड जेनर ने चेचक के टीके की खोज की थी। टीके हमारे शरीर में बीमारियों से लड़ने की शक्ति (Antibodies) पैदा करते हैं।
मिट्टी की उर्वरता: कुछ जीवाणु वायुमंडल की नाइट्रोजन को मिट्टी में मिलाते हैं जिससे फसल अच्छी होती है।
4. हानिकारक सूक्ष्मजीव (शत्रु)
रोग फैलाने वाले जीव: इन्हें ‘रोगाणु’ कहते हैं। ये हैजा, जुकाम, चिकनपॉक्स और टीबी जैसे रोग फैलाते हैं।
खाद्य विषाक्तन (Food Poisoning): कभी-कभी सूक्ष्मजीव खाने में जहरीले पदार्थ पैदा कर देते हैं, जिसे खाने से इंसान बीमार हो सकता है।
5. खाद्य परिरक्षण (भोजन को बचाने के तरीके)
नमक और चीनी: जैम और अचार को खराब होने से बचाते हैं।
तेल और सिरका: इनके उपयोग से बैक्टीरिया नहीं पनपते।
गर्म और ठंडा करना: दूध को उबालकर रखने से सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं। पाश्चुरीकरण (Pasteurization) में दूध को 70 डिग्री पर गर्म करके तुरंत ठंडा किया जाता है।
भंडारण: मेवों और सब्जियों को वायुरुद्ध (Air-tight) पैकेट में बंद करना
अध्याय 3: कोयला और पेट्रोलियम (Detailed Notes)
1. प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources)
प्रकृति से मिलने वाले संसाधनों को दो भागों में बाँटा गया है:
अक्षय प्राकृतिक संसाधन: जो असीमित मात्रा में हैं और कभी खत्म नहीं होंगे। जैसे—सूर्य का प्रकाश और वायु।
समाप्त होने वाले संसाधन: जो सीमित मात्रा में हैं और मानवीय गतिविधियों से खत्म हो सकते हैं। जैसे—वन, कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।
2. कोयला (Coal)
यह एक कठोर, काले रंग का पत्थर जैसा पदार्थ है। यह लाखों साल पहले पृथ्वी के नीचे दबे घने वनों के उच्च दाब और उच्च ताप पर धीरे-धीरे दबने से बना। इस प्रक्रिया को ‘कार्बनीकरण’ कहते हैं।
कोक (Coke): यह कोयले का शुद्ध रूप है। इसका उपयोग इस्पात के औद्योगिक निर्माण में किया जाता है।
कोलतार (Coal Tar): यह एक काला गाढ़ा द्रव है। इसका उपयोग रंग, दवा, इत्र और सड़क बनाने में किया जाता है। (आजकल सड़क के लिए ‘बिटुमेन’ का प्रयोग अधिक होता है)।
कोयला गैस (Coal Gas): कोयले से कोक बनाते समय यह गैस निकलती है, जिसका उपयोग उद्योगों में ईंधन के रूप में होता है।
3. पेट्रोलियम (Petroleum)
पेट्रोलियम का निर्माण समुद्र में रहने वाले जीवों से हुआ। जब ये जीव मरे, तो इनके शरीर समुद्र के पेंदे में दब गए और लाखों सालों तक बिना हवा, उच्च दाब और ताप के कारण पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस में बदल गए।
पेट्रोलियम परिष्करण (Refining): पेट्रोलियम को उसके विभिन्न घटकों (जैसे पेट्रोल, डीजल, मोम, स्नेहक तेल) में अलग करने की प्रक्रिया को परिष्करण कहते हैं। यह काम ‘पेट्रोलियम रिफाइनरी’ में होता है।
4. प्राकृतिक गैस (Natural Gas)
यह एक बहुत महत्वपूर्ण और स्वच्छ ईंधन है।
CNG (Compressed Natural Gas): इसे उच्च दाब पर संपीड़ित किया जाता है। इसका उपयोग आजकल गाड़ियों में प्रदूषण कम करने के लिए किया जा रहा है।
इसका उपयोग घरों और कारखानों में पाइपों के माध्यम से सीधे जलाने के लिए भी होता है।
अध्याय 4: दहन और ज्वाला (Detailed Notes)
1. दहन (Combustion) क्या है?
वह रासायनिक प्रक्रम जिसमें पदार्थ ऑक्सीजन से अभिक्रिया कर ऊष्मा देता है, उसे दहन कहते हैं। जो पदार्थ जलते हैं, उन्हें ‘दाह्य’ (Combustible) या ईंधन कहा जाता है।
2. दहन के लिए आवश्यक शर्तें:
ईंधन: जलने वाला पदार्थ।
वायु (ऑक्सीजन): दहन में सहायक।
ज्वलन ताप (Ignition Temperature): वह न्यूनतम तापमान जिस पर कोई पदार्थ आग पकड़ लेता है। (जैसे: कागज़ का ज्वलन ताप कम है, इसलिए वह जल्दी आग पकड़ता है)।
3. आग पर नियंत्रण कैसे पाएं?
आग बुझाने के लिए तीन में से किसी एक चीज़ को हटाना पड़ता है: हवा की आपूर्ति काटना, ईंधन हटाना या तापमान कम करना।
जल: यह सबसे अच्छा अग्निशामक है, लेकिन तेल और बिजली की आग के लिए जल का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
CO2 (कार्बन डाइऑक्साइड): बिजली के उपकरणों और पेट्रोल की आग के लिए सबसे अच्छा अग्निशामक है क्योंकि यह ऑक्सीजन से भारी होने के कारण आग को कंबल की तरह ढक लेती है।
4. ज्वाला की संरचना (Structure of Flame)
एक मोमबत्ती की ज्वाला के तीन क्षेत्र होते हैं:
सबसे बाहरी क्षेत्र (नीला): यहाँ पूर्ण दहन होता है और यह सबसे गर्म भाग है।
मध्य भाग (पीला): यहाँ आंशिक दहन होता है और यह कम गर्म होता है।
सबसे आंतरिक क्षेत्र (काला): यहाँ बिना जले कार्बन के कण होते हैं और यह सबसे कम गर्म होता है।
5. आदर्श ईंधन के गुण:
एक अच्छा ईंधन वह है जो:
सस्ता और आसानी से उपलब्ध हो।
अधिक ऊष्मा (कैलोरी मान) दे।
हानिकारक गैसें न छोड़े।
जलने के बाद कोई राख या अवशेष न छोड़े।
अध्याय 5: पौधों एवं जंतुओं का संरक्षण (Detailed Notes)
1. वनोन्मूलन (Deforestation) और इसके कारण
वनों को समाप्त करने और उस भूमि का अन्य कार्यों में उपयोग करने को वनोन्मूलन कहते हैं।
मुख्य कारण: खेती के लिए जमीन, घर और कारखाने बनाना, फर्नीचर के लिए लकड़ी, और जलावन के लिए लकड़ी का उपयोग।
प्राकृतिक कारण: भीषण सूखा और वनों में लगने वाली आग (दावानल)।
2. वनोन्मूलन के परिणाम
पृथ्वी पर तापमान और प्रदूषण के स्तर में वृद्धि।
वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) का बढ़ना, जिससे ‘ग्लोबल वार्मिंग’ होती है।
वर्षा में कमी और भूमि की उपजाऊ शक्ति का कम होना। इससे भूमि धीरे-धीरे रेगिस्तान में बदल जाती है, जिसे ‘मरुस्थलीकरण’ कहते हैं।
3. जैव मंडल का संरक्षण
सरकार ने वन्य जीवन को बचाने के लिए कुछ विशेष क्षेत्र बनाए हैं:
अभयारण्य (Wildlife Sanctuary): वह स्थान जहाँ जंतु और उनके आवास किसी भी प्रकार के विक्षोभ से सुरक्षित रहते हैं।
राष्ट्रीय उद्यान (National Park): वन्य जीवों के लिए आरक्षित क्षेत्र जहाँ वे स्वतंत्र रूप से प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं।
जैव-मंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve): वन्य जीवन, पौधों, जंतु संसाधनों और उस क्षेत्र के आदिवासियों के पारंपरिक जीवन के संरक्षण के लिए बड़ा क्षेत्र।
4. वनस्पतिजात (Flora) और प्राणिजात (Fauna)
किसी विशेष क्षेत्र में पाए जाने वाले पेड़-पौधों को उस क्षेत्र के वनस्पतिजात कहते हैं। (जैसे: साल, सागौन, आम)।
किसी विशेष क्षेत्र में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं को उस क्षेत्र के प्राणिजात कहते हैं। (जैसे: चिंकारा, नीलगाय, तेंदुआ)।
5. रेड डाटा पुस्तक (Red Data Book)
यह वह पुस्तक है जिसमें सभी संकटपन्न (Endangered) प्रजातियों का रिकॉर्ड रखा जाता है। पौधों, जंतुओं और अन्य प्रजातियों के लिए अलग-अलग रेड डाटा पुस्तकें हैं।
अध्याय 6: जंतुओं में जनन (Detailed Notes)
1. जनन (Reproduction) का महत्व
प्रजातियों की निरंतरता बनाए रखने के लिए जनन बहुत आवश्यक है। यदि जीव जनन नहीं करेंगे, तो उनकी प्रजाति पृथ्वी से विलुप्त हो जाएगी।
2. जनन की विधियाँ
जंतुओं में जनन की दो मुख्य विधियाँ हैं:
लैंगिक जनन (Sexual Reproduction): वह जनन जिसमें नर और मादा युग्मक का संलयन होता है।
अलैंगिक जनन (Asexual Reproduction): वह जनन जिसमें केवल एक ही जनक नए जीव को जन्म देता है।
3. लैंगिक जनन और निषेचन
नर जनन अंग: एक जोड़ी वृषण, दो शुक्रवाहिका और एक शिश्न। वृषण ‘शुक्राणु’ उत्पन्न करते हैं।
मादा जनन अंग: एक जोड़ी अंडाशय, अंडवाहिनी और गर्भाशय। अंडाशय ‘अंडाणु’ उत्पन्न करते हैं।
निषेचन: शुक्राणु और अंडाणु के मिलन को निषेचन कहते हैं। इससे ‘युग्मनज’ (Zygote) बनता है।
4. निषेचन के प्रकार
आंतरिक निषेचन: जो मादा के शरीर के अंदर होता है (जैसे: मनुष्य, गाय, कुत्ता और मुर्गी)।
बाह्य निषेचन: जो मादा के शरीर के बाहर होता है। यह अक्सर पानी में रहने वाले जीवों में होता है (जैसे: मेंढक, मछली, स्टारफिश)।
5. अलैंगिक जनन के उदाहरण
मुकुलन (Budding): जैसे हाइड्रा में शरीर पर एक उभार निकलता है, जो बाद में अलग होकर नया जीव बन जाता है।
द्विखंडन (Binary Fission): जैसे अमीबा में, जहाँ एक कोशिका दो भागों में विभाजित होकर दो नए जीव बनाती है।
अध्याय 7: किशोरावस्था की ओर (Detailed Notes)
1. किशोरावस्था (Adolescence) क्या है?
जीवन काल की वह अवधि जब शरीर में ऐसे परिवर्तन होते हैं जिनके परिणामस्वरूप जनन परिपक्वता आती है, किशोरावस्था कहलाती है। यह लगभग 11 वर्ष की आयु से प्रारंभ होकर 18 या 19 वर्ष की आयु तक रहती है। किशोरों को ‘टीनएजर्स’ (Teenagers) भी कहा जाता है।
2. किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तन:
लम्बाई में वृद्धि: इस काल में हाथ और पैरों की हड्डियाँ लंबी हो जाती हैं और व्यक्ति लंबा हो जाता है।
शारीरिक आकृति में परिवर्तन: लड़कों के कंधे चौड़े हो जाते हैं और लड़कियों का कमर का निचला भाग चौड़ा हो जाता है।
स्वर में परिवर्तन: लड़कों का स्वरयंत्र (Larynx) बड़ा हो जाता है और उनकी आवाज़ फटने या भारी होने लगती है। इसे ‘एडम्स एप्पल’ (Adam’s Apple) कहते हैं।
स्वेद एवं तेल ग्रंथियों की सक्रियता: चेहरे पर फुंसियाँ और मुँहासे (Acne) निकलने लगते हैं।
3. हॉर्मोन (Hormones):
हमारे शरीर में होने वाले परिवर्तनों को रासायनिक पदार्थ नियंत्रित करते हैं, जिन्हें हॉर्मोन कहते हैं। ये अंत:स्रावी ग्रंथियों से निकलते हैं।
टेस्टोस्टेरोन (Testosterone): यह पुरुष हॉर्मोन है जो लड़कों में बदलाव लाता है।
एस्ट्रोजेन (Estrogen): यह स्त्री हॉर्मोन है जो लड़कियों में बदलाव लाता है।
4. स्वास्थ्य और आहार:
किशोरों को संतुलित आहार लेना चाहिए (प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा)। लोह (Iron) तत्व खून बनाने के लिए ज़रूरी है, इसलिए हरी पत्तेदार सब्जियाँ और गुड़ खाना चाहिए। नशीली दवाओं (Drugs) से हमेशा दूर रहना चाहिए।
अध्याय 8: बल तथा दाब (Detailed Notes)
1. बल (Force) क्या है?
किसी वस्तु पर लगने वाले धक्के (Abscission) या खिंचाव (Pull) को बल कहते हैं। बल लगाने के लिए कम से कम दो वस्तुओं के बीच अन्योन्यक्रिया (Interaction) होना आवश्यक है।
2. बल के प्रभाव:
बल किसी स्थिर वस्तु को गतिशील बना सकता है।
बल गतिशील वस्तु की चाल बदल सकता है।
बल किसी वस्तु की आकृति (Shape) को बदल सकता है (जैसे गूँधे हुए आटे की लोई बनाना)।
3. बल के प्रकार:
दो मुख्य प्रकार के बल होते हैं:
A. संपर्क बल (Contact Forces): जब बल लगाने वाली वस्तु दूसरी वस्तु के संपर्क में हो।
पेशीय बल: हमारी मांसपेशियों द्वारा लगाया गया बल (जैसे बाल्टी उठाना)।
घर्षण बल: जो गति का विरोध करता है (जैसे फर्श पर लुढ़कती गेंद का रुक जाना)।
B. असंपर्क बल (Non-contact Forces): जब वस्तुएं एक-दूसरे के संपर्क में न हों।
चुंबकीय बल: चुंबक द्वारा लोहे की वस्तुओं पर लगाया गया बल।
स्थिर वैद्युत बल: एक आवेशित वस्तु द्वारा दूसरी वस्तु पर लगाया गया बल।
गुरुत्वाकर्षण बल: पृथ्वी द्वारा हर वस्तु को अपनी ओर खींचने का बल।
4. दाब (Pressure):
किसी पृष्ठ के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब कहते हैं।
सूत्र: Pressure = \frac{Force}{Area}
क्षेत्रफल जितना कम होगा, दाब उतना ही अधिक होगा (इसीलिए कील का सिरा नुकीला होता है)।
वायुमंडल द्वारा लगाया गया दाब ‘वायुमंडलीय दाब’ कहलाता है।
अध्याय 9: घर्षण (Detailed Notes)
1. घर्षण (Friction) क्या है?
जब एक वस्तु दूसरी वस्तु की सतह पर गति करती है, तो उनके बीच एक बल कार्य करता है जो गति का विरोध करता है। इस बल को घर्षण बल कहते हैं।
घर्षण हमेशा गति की विपरीत दिशा में कार्य करता है।
घर्षण संपर्क में आने वाले दोनों पृष्ठों की अनियमितताओं (Irregularities) के कारण होता है।
2. घर्षण को प्रभावित करने वाले कारक:
पृष्ठ की प्रकृति: चिकनी सतह पर घर्षण कम होता है और खुरदरी सतह पर घर्षण अधिक होता है।
वस्तु का भार: वस्तु जितनी भारी होगी, घर्षण उतना ही अधिक होगा।
3. घर्षण के प्रकार:
स्थैतिक घर्षण (Static Friction): जब वस्तु विराम अवस्था में हो और उसे गति में लाने का प्रयास किया जाए।
सर्पी घर्षण (Sliding Friction): जब एक वस्तु दूसरी वस्तु पर सरकती है। (यह स्थैतिक घर्षण से कम होता है)।
लोटनिक घर्षण (Rolling Friction): जब कोई वस्तु किसी सतह पर लुढ़कती है (जैसे पहिया)। यह सबसे कम होता है।
4. घर्षण: हानिकारक या लाभदायक?
लाभ: हम घर्षण के कारण ही चल पाते हैं, पेन से कागज पर लिख पाते हैं और वाहनों में ब्रेक लगा पाते हैं।
हानि: मशीनों के कलपुर्जे घिस जाते हैं, ऊर्जा की बर्बादी होती है और गर्मी (ऊष्मा) पैदा होती है।
5. घर्षण बढ़ाना और घटाना:
घटाने के तरीके: स्नेहक (Lubricants) जैसे तेल या ग्रीस का उपयोग करना, बॉल-बेयरिंग का उपयोग करना।
बढ़ाने के तरीके: जूतों के तलवों को खांचेदार बनाना, टायरों में गोटी (Treads) बनाना।
अध्याय 10: ध्वनि (Detailed Notes)
1. ध्वनि (Sound) का उत्पन्न होना:
ध्वनि वस्तुओं के कंपन (Vibration) द्वारा उत्पन्न होती है। जब कोई वस्तु तेजी से आगे-पीछे गति करती है, तो वह ध्वनि पैदा करती है।
मनुष्यों में ध्वनि ‘वाक्-यंत्र’ या लैरिंग्स (Larynx) द्वारा उत्पन्न होती है। इसमें दो वाक्-तंतु होते हैं जिनके बीच से हवा निकलने पर कंपन होता है।
2. ध्वनि का संचरण (Propagation):
ध्वनि को चलने के लिए किसी माध्यम (Medium) की आवश्यकता होती है।
ध्वनि ठोस, द्रव और गैस में चल सकती है।
निर्वात (Vacuum): जहाँ हवा न हो, वहां ध्वनि नहीं चल सकती (जैसे अंतरिक्ष में)।
3. हम ध्वनि को कैसे सुनते हैं?
हमारे कान का बाहरी भाग कीप (Funnel) जैसा होता है। ध्वनि अंदर जाकर कर्ण-पटह (Ear Drum) से टकराती है और उसे कंपित करती है। ये कंपन मस्तिष्क तक पहुँचते हैं।
4. ध्वनि के लक्षण:
आयाम (Amplitude): कंपन जितना बड़ा होगा, ध्वनि उतनी ही प्रबल (Loud) होगी। प्रबलता को डेसिबल (dB) में मापते हैं।
आवृत्ति (Frequency): प्रति सेकंड होने वाले कंपनों की संख्या। आवृत्ति अधिक होने पर ध्वनि तीखी (Shrill) होती है (जैसे महिला की आवाज़)। इसे हर्ट्ज़ (Hz) में मापते हैं।
5. श्रव्य और अश्रव्य ध्वनि:
श्रव्य: 20 Hz से 20,000 Hz के बीच की ध्वनि जिसे इंसान सुन सकता है।
अश्रव्य: 20 Hz से कम या 20,000 Hz से अधिक की ध्वनि।
6. शोर प्रदूषण (Noise Pollution):
अवांछित और कष्टदायक ध्वनि को शोर कहते हैं। इससे सुनने की शक्ति कम होना, तनाव और नींद न आना जैसी समस्याएँ होती हैं।
अध्याय 11: विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव (Detailed Notes)
1. क्या द्रव विद्युत चालन करते हैं?
कुछ द्रव विद्युत के सुचालक होते हैं और कुछ हीन चालक।
सुचालक: नींबू का रस, सिरका, नल का पानी, नमक का घोल।
हीन चालक: आसुत जल (Distilled Water), शहद, तेल, चीनी का घोल।
2. विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव:
जब किसी चालक द्रव में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो वहां रासायनिक अभिक्रिया होती है। इसके परिणाम स्वरूप:
इलेक्ट्रोडों पर गैस के बुलबुले बन सकते हैं।
इलेक्ट्रोडों पर धातु के निक्षेप (जमाव) देखे जा सकते हैं।
विलयन के रंग में परिवर्तन हो सकता है।
3. विद्युत लेपन (Electroplating):
विद्युत द्वारा किसी पदार्थ पर किसी वांछित धातु की परत चढ़ाने की प्रक्रिया को विद्युत लेपन कहते हैं।
उपयोग: कारों के हिस्सों, साइकिल के हैंडल, और रसोई के बर्तनों पर क्रोमियम की परत चढ़ाना ताकि वे चमकें और उनमें जंग न लगे। सस्ती धातुओं पर सोने या चाँदी की परत चढ़ाकर आभूषण बनाना।
अध्याय 12: कुछ प्राकृतिक परिघटनाएँ (Detailed Notes)
1. तड़ित (Lightning):
बादलों में आवेश (Charge) के इकट्ठा होने से बिजली पैदा होती है। रगड़ द्वारा वस्तुओं को आवेशित किया जा सकता है।
सजातीय (एक जैसे) आवेश: एक-दूसरे को प्रतिकर्षित (दूर धकेलना) करते हैं।
विजातीय (अलग) आवेश: एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं।
2. तड़ित से सुरक्षा:
बिजली कड़कते समय खुले मैदान में न रहें।
यदि आप घर के अंदर हैं, तो टेलीफोन के तारों और धातु के पाइपों को न छुएं।
तड़ित चालक: ऊँची इमारतों को बिजली से बचाने के लिए उनके ऊपर एक धातु की छड़ लगाई जाती है जो बिजली को सीधे ज़मीन में भेज देती है।
3. भूकंप (Earthquake):
पृथ्वी की ऊपरी परत (क्रस्ट) के अंदर आने वाले विक्षोभ के कारण पृथ्वी का हिलना भूकंप कहलाता है।
भूकंप के कारण: पृथ्वी की प्लेटों का एक-दूसरे से रगड़ना या टकराना।
रिक्टर पैमाना: भूकंप की तीव्रता मापने वाला पैमाना। 7 से अधिक तीव्रता वाले भूकंप बहुत विनाशकारी होते हैं।
सीस्मोग्राफ: वह उपकरण जो भूकंपीय तरंगों को रिकॉर्ड करता है।
अध्याय 13: प्रकाश (Detailed Notes)
1. परावर्तन के नियम (Laws of Reflection):
आपतन कोण (i): हमेशा परावर्तन कोण (r) के बराबर होता है (\angle i = \angle r).
आपतित किरण, परावर्तित किरण और अभिलंब: ये तीनों एक ही तल में होते हैं।
2. नियमित और विसरित परावर्तन:
नियमित: जब प्रकाश किसी चिकनी सतह (दर्पण) से टकराता है। इसमें साफ़ प्रतिबिंब बनता है।
विसरित: जब प्रकाश किसी खुरदरी सतह से टकराता है और अलग-अलग दिशाओं में फैल जाता है।
3. पार्श्व परिवर्तन (Lateral Inversion):
दर्पण में बायाँ भाग दायाँ और दायाँ भाग बायाँ दिखाई देता है, इसे पार्श्व परिवर्तन कहते हैं।
4. मानव नेत्र (The Human Eye):
कॉर्निया: आँख का बाहरी पारदर्शी भाग।
परितारिका (Iris): आँख का रंगीन भाग जो पुतली के साइज़ को नियंत्रित करता है।
रेटिना: आँख का पर्दा जहाँ प्रतिबिंब बनता है।
अंध-बिंदु: जहाँ कोई दृष्टि तंत्रिका नहीं होती, वहां कुछ दिखाई नहीं देता।
5. ब्रेल पद्धति (Braille System):
चाक्षुष विकृति (जो देख नहीं सकते) वाले व्यक्तियों के लिए पढ़ने-लिखने की सबसे लोकप्रिय पद्धति ‘ब्रेल’ है। इसे लुई ब्रेल ने विकसित किया था। इसमें 63 बिंदुकित पैटर्न होते हैं।
Ward ki Asli “Ground Reality” (Solid Style)
“Dekho bhaiyo, kitabon mein padhna ek alag duniya hai, lekin jab asliyat mein ward mein khade hokar patient ki care karni padti hai, tab samajh aata hai ki asli Nursing kya hoti hai. Maine apni GNM, Post BSc, aur MSc Nursing ki jo padhai kari hai, uska poora nichod aur ICU mein bitaye huye mere hazaron ghanton ka tajurba maine is post mein daal diya hai. Ye koi computer se copy kiya hua maal nahi hai, balki mere apne hathon ki mehnat hai jo maine aapke liye din-raat ek karke likhi hai. Ise dhyan se padhna, kyunki ye aapko ek kabil professional banayega.”
Bexyhub ka “Asli Mission” (Trust Wala Style)
“Maine jab Bexyhub ki neenv rakhi thi, tab mera ek hi lakshya tha: ki hamare nursing students ko wahi saaf aur sacchi jankari mile jo unke career mein kaam aaye. In 125 posts ki har ek line ke piche meri MSc ki research aur mera clinical anubhav chupa hai. Main koi bada machine nahi hoon, main aapka wahi Deepak hoon jo khud in raaston se guzar kar aaj ek Nursing Officer bana hai. Is post mein maine wahi bhasha use kari hai jo hum ward mein ek-dusre ko samjhane ke liye karte hain, taaki aapko rathna na pade.”
Exam nikalne ka “Desi Formula” (Topper Style)
“Doston, NORCET ho ya State PSC, exam nikalne ke liye sirf padhna kaafi nahi hota, balki ye pata hona chahiye ki kya padhna hai. Maine khud ye sab exams diye hain aur aaj ek Nursing Officer ke roop mein kaam kar raha hoon. In notes mein maine un barikiyon ko pakda hai jo aksar exams mein puchi jati hain lekin kitabon mein dhang se nahi milti. Ye content ekdum ‘Human-Made’ hai aur meri imandari ka saboot hai. Ise padho aur khud fark mehsoos karo.”
यह पोस्ट केवल शैक्षिक उद्देश्यों (Educational Purposes) के लिए साझा की गई है। यहाँ दी गई जानकारी मेरे नर्सिंग अनुभव और अध्ययन पर आधारित है। यदि आपको किसी जानकारी पर संदेह है या कोई शिकायत है, तो कृपया कमेंट बॉक्स में बताएं या हमसे संपर्क करें। किसी भी चिकित्सीय निर्णय के लिए पेशेवर डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
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