भारत में राष्ट्रवाद: कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान – संपूर्ण अध्याय (Full Chapter)

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भारत में राष्ट्रवाद: कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान – संपूर्ण अध्याय (Full Chapter)

राष्ट्रवाद का परिचय और भारतीय संदर्भ


राष्ट्रवाद का अर्थ है अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम, गौरव और एकता की भावना। यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय राष्ट्र-राज्यों के निर्माण के साथ हुआ, लेकिन भारत जैसे उपनिवेशों में राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन के साथ हुआ। ब्रिटिश शासन के दमन ने विभिन्न समूहों को एक साथ आने के लिए मजबूर किया, जिससे भारतीय राष्ट्रवाद की नींव पड़ी।

प्रथम विश्व युद्ध और भारत पर उसका प्रभाव (1914-1918)


प्रथम विश्व युद्ध ने भारत की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पूरी तरह बदल दी थी:
रक्षा खर्च में वृद्धि: ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के खर्च के लिए करों (Taxes) में भारी बढ़ोतरी की और ‘आयकर’ (Income Tax) शुरू किया।
कीमतों में वृद्धि: 1913 से 1918 के बीच चीजों की कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे आम जनता का जीना मुश्किल हो गया।
जबरन भर्ती: गांवों से लोगों को जबरन सेना में भर्ती किया गया, जिससे ग्रामीण इलाकों में भारी गुस्सा था।
अकाल और महामारी: 1918-19 और 1920-21 में फसलें खराब हो गईं और इन्फ्लूएंजा की महामारी फैल गई, जिसमें लाखों लोग मारे गए। लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध के बाद मुसीबतें कम होंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

महात्मा गांधी का आगमन और सत्याग्रह का सिद्धांत


जनवरी 1915 में गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने ‘सत्याग्रह’ का एक नया तरीका पेश किया।
सत्याग्रह का अर्थ: इसका अर्थ है ‘सत्य का आग्रह’। गांधी जी के अनुसार, अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, तो आपको अन्याय से लड़ने के लिए शारीरिक बल की ज़रूरत नहीं है। एक सत्याग्रही केवल अहिंसा के ज़रिए दुश्मन की अंतरात्मा को झकझोर कर जीत हासिल कर सकता है।
भारत में शुरुआती प्रयोग:
चंपारण (1917): बिहार के किसानों को दमनकारी नील खेती व्यवस्था के खिलाफ प्रेरित किया।
खेड़ा (1917): गुजरात के किसानों की फसल खराब होने के कारण लगान माफी की लड़ाई लड़ी।
अहमदाबाद (1918): सूती मिल मजदूरों के वेतन बढ़ाने के लिए सफल आंदोलन किया।

रॉलेट एक्ट (1919) – दमनकारी कानून


ब्रिटिश सरकार ने इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद रॉलेट एक्ट पारित कर दिया।
प्रावधान: सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमा चलाए 2 साल तक जेल में रखने की शक्ति मिल गई।
गांधी जी की प्रतिक्रिया: उन्होंने इसके खिलाफ 6 अप्रैल 1919 को एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।

जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)


10 अप्रैल को अमृतसर में पुलिस ने शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चलाई, जिसके बाद मार्शल लॉ लगा दिया गया और कमान जनरल डायर को सौंप दी गई।
घटना: बैसाखी के दिन लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए थे। डायर ने बाग के बाहर निकलने वाले सारे रास्ते बंद कर दिए और अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं।
प्रभाव: इस नरसंहार के बाद पूरे उत्तर भारत में लोग सड़कों पर उतर आए। गांधी जी ने हिंसा बढ़ते देख रॉलेट सत्याग्रह वापस ले लिया।

खिलाफत और असहयोग आंदोलन की शुरुआत


गांधी जी जानते थे कि बिना हिंदू और मुस्लिमों को साथ लाए कोई बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा किया जा सकता।
खिलाफत मुद्दा: प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद खलीफा की शक्तियां छीनने की खबर थी। इसके विरोध में मोहम्मद अली और शौकत अली ने खिलाफत आंदोलन शुरू किया।
कलकत्ता अधिवेशन (सितंबर 1920): गांधी जी ने कांग्रेस को खिलाफत और स्वराज्य के समर्थन में असहयोग आंदोलन शुरू करने के लिए राजी कर लिया।

असहयोग आंदोलन के विविध स्वरूप


जनवरी 1921 में आंदोलन शुरू हुआ। अलग-अलग लोगों के लिए इसका मतलब अलग था:
शहरों में: हजारों छात्रों ने स्कूल छोड़ दिए, वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।
ग्रामीण इलाकों में: अवध में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसानों ने जमींदारों के खिलाफ आंदोलन किया।
बागानों में: असम के मजदूरों ने ‘इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट’ का विरोध किया और अपने घरों की ओर निकल पड़े।

सविनय अवज्ञा की ओर (1922-1930)


चौरी-चौरा (1922): गोरखपुर में भीड़ ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी, जिससे 22 पुलिसकर्मी मर गए। गांधी जी ने तुरंत असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
साइमन कमीशन (1928): जब यह कमीशन भारत आया, तो “साइमन गो बैक” के नारों से स्वागत हुआ क्योंकि इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था।
पूर्ण स्वराज्य (1929): जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज्य’ की मांग की गई और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया।

नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन


गांधी जी ने नमक को देश को एकजुट करने का जरिया बनाया क्योंकि नमक अमीर-गरीब सब इस्तेमाल करते थे।
दांडी मार्च: 12 मार्च 1930 को 78 साथियों के साथ साबरमती से दांडी की यात्रा शुरू की। 6 अप्रैल को नमक बनाकर कानून तोड़ा।
आंदोलन का विस्तार: पूरे देश में नमक कानून तोड़ा गया, शराब की दुकानों की पिकेटिंग की गई और किसानों ने कर देने से मना कर दिया।

आंदोलन की सीमाएं और सामूहिक अपनेपन का भाव


अछूतों की भागीदारी: दलितों ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा नहीं लिया क्योंकि वे अपने लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र चाहते थे (डॉ. अंबेडकर और गांधी जी के बीच पूना पैक्ट 1932 हुआ)।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: राष्ट्रवाद केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि कल्पना से भी जन्मा।
भारत माता: बंकिम चंद्र ने इसे रूप दिया।
लोक कथाएं: नटेसा शास्त्री जैसे विद्वानों ने लोक कथाओं को संकलित किया।
झंडा: गांधी जी ने 1921 में ‘स्वराज्य ध्वज’ तैयार किया।

अध्याय 2: भारत में राष्ट्रवाद – कक्षा 10 सामाजिक विज्ञान (Full Digital Book Notes)
भूमिका: राष्ट्रवाद का उदय (H2)
आधुनिक राष्ट्रवाद का जन्म यूरोप में हुआ था, लेकिन भारत में इसकी जड़ें ब्रिटिश शासन के खिलाफ हुए संघर्षों में छिपी हैं। उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों ने भारत के अलग-अलग वर्गों को एक सूत्र में बांध दिया। हालांकि हर वर्ग (किसान, मजदूर, अमीर) पर अंग्रेजों के अत्याचार का असर अलग था, लेकिन महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन सभी समूहों को एकजुट करके एक विशाल आंदोलन का रूप दिया।

प्रथम विश्व युद्ध का भारत पर गहरा प्रभाव


1914 से 1918 के बीच हुए प्रथम विश्व युद्ध ने भारत की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह बदल दिया था:
भारी टैक्स का बोझ: युद्ध के खर्चे को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने भारत में ‘सीमा शुल्क’ (Customs Duties) बढ़ा दिया और पहली बार ‘आयकर’ (Income Tax) की शुरुआत की।
कीमतों की मार: युद्ध के दौरान चीजों की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ीं, जिससे आम जनता का जीवन नरक बन गया।
जबरन सेना में भर्ती: ग्रामीण इलाकों से युवाओं को जबरदस्ती अंग्रेजी सेना में भर्ती किया गया, जिससे गांवों में अंग्रेजों के प्रति भारी गुस्सा पैदा हुआ।
अकाल और बीमारी: 1918-19 और 1920-21 के दौरान देश के कई हिस्सों में फसलें खराब हो गईं और इन्फ्लूएंजा (Flu) जैसी महामारी फैल गई, जिसमें लगभग 120-130 लाख लोग मारे गए।

महात्मा गांधी और सत्याग्रह का नया विचार


महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे। वहां उन्होंने नस्लभेदी शासन के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ का सफल प्रयोग किया था।
सत्याग्रह का सिद्धांत: गांधी जी का मानना था कि यदि आपका उद्देश्य सच्चा है और आपकी लड़ाई अन्याय के खिलाफ है, तो आपको शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। अहिंसा के जरिए दुश्मन की अंतरात्मा को झकझोर कर उसे सच देखने पर मजबूर किया जा सकता है।
भारत में गांधी जी के शुरुआती आंदोलन:
चंपारण सत्याग्रह (1917): बिहार में दमनकारी नील खेती व्यवस्था के खिलाफ किसानों का साथ दिया।
खेड़ा सत्याग्रह (1917): गुजरात के खेड़ा जिले के किसान फसल खराब होने के कारण लगान नहीं दे पा रहे थे, गांधी जी ने उनकी लगान माफी की लड़ाई लड़ी।
अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918): सूती मिल मजदूरों के वेतन में वृद्धि के लिए सफल सत्याग्रह किया।

रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग का काला अध्याय


1919 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद ‘रॉलेट एक्ट’ पास कर दिया।
काला कानून: इस कानून ने सरकार को यह शक्ति दी कि वह किसी भी राजनीतिक व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए 2 साल तक जेल में रख सकती है।
जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919): अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोग बैसाखी के मेले और रॉलेट एक्ट का शांतिपूर्ण विरोध करने जमा हुए थे। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के भीड़ पर गोलियां चलवा दीं। इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश भर दिया और गांधी जी ने इसे “हिमालय जैसी भूल” कहा।

खिलाफत और असहयोग आंदोलन का तालमेल


गांधी जी जानते थे कि हिंदू और मुसलमानों को साथ लाए बिना कोई बड़ा आंदोलन नहीं हो सकता। उसी समय तुर्की के खलीफा की शक्तियां छीने जाने के विरोध में ‘खिलाफत आंदोलन’ शुरू हुआ था।
कलकत्ता अधिवेशन (1920): गांधी जी ने कांग्रेस को राजी किया कि ‘खिलाफत’ और ‘स्वराज्य’ के लिए एक साझा असहयोग आंदोलन शुरू किया जाए।
असहयोग का विचार: गांधी जी ने अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ (1909) में लिखा था कि “भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही चल रहा है, अगर हम सहयोग बंद कर दें तो साल भर में अंग्रेजी राज खत्म हो जाएगा।”

असहयोग आंदोलन के विविध रूप और चुनौतियां


यह आंदोलन जनवरी 1921 में शुरू हुआ। समाज के हर वर्ग ने इसमें भाग लिया:
शहरों में: हजारों छात्रों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए, वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।
ग्रामीण क्षेत्रों में: अवध में बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में किसानों ने बेगार और भारी लगान के खिलाफ विद्रोह किया।
आदिवासी क्षेत्रों में: आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों में अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में आदिवासियों ने गोरिल्ला युद्ध छेड़ा। वे गांधी जी के प्रशंसक थे लेकिन उनका मानना था कि आजादी केवल बल प्रयोग से ही मिल सकती है।
बागानों में: असम के चाय बागान मजदूरों ने ‘इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट’ के खिलाफ विद्रोह किया और अपने घरों की ओर निकल पड़े। उनके लिए स्वराज्य का मतलब था “अपने गांव जाने की आजादी”।

चौरी-चौरा कांड और आंदोलन की वापसी


फरवरी 1922 में गोरखपुर के चौरी-चौरा में एक शांतिपूर्ण जुलूस हिंसक हो गया और भीड़ ने एक पुलिस स्टेशन को आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गांधी जी अहिंसा के पुजारी थे, इसलिए उन्होंने तुरंत असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।

साइमन कमीशन और पूर्ण स्वराज्य की मांग


साइमन कमीशन (1928): ब्रिटिश सरकार ने भारत में संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए एक कमीशन भेजा, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। पूरे देश में “साइमन वापस जाओ” (Simon Go Back) के नारे लगे।
लाहौर अधिवेशन (1929): जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज्य’ का संकल्प लिया और 26 जनवरी 1930 को पहला स्वतंत्रता दिवस मनाने की घोषणा की।

नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन


गांधी जी ने नमक को एकता का प्रतीक बनाया क्योंकि नमक का उपयोग अमीर और गरीब दोनों करते थे।
दांडी मार्च: 12 मार्च 1930 को गांधी जी ने साबरमती से 240 मील दूर दांडी के लिए यात्रा शुरू की। 6 अप्रैल को उन्होंने समुद्र तट पर नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को चुनौती दी।
आंदोलन की विशेषता: इस बार लोगों को केवल सहयोग न करने के लिए ही नहीं, बल्कि ब्रिटिश कानूनों को शांतिपूर्वक तोड़ने के लिए भी कहा गया। महिलाओं ने शराब की दुकानों की पिकेटिंग की और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया।

गोलमेज सम्मेलन और गांधी-इरविन समझौता


सविनय अवज्ञा आंदोलन की बढ़ती ताकत देख वायसराय इरविन ने गांधी जी के साथ समझौता किया (5 मार्च 1931)। इसके तहत गांधी जी दूसरे गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) में भाग लेने लंदन गए, लेकिन वार्ता असफल रही और उन्होंने भारत आकर आंदोलन फिर शुरू किया।

सामूहिक अपनेपन का भाव और राष्ट्रीय प्रतीक


राष्ट्रवाद केवल लड़ाई से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव से भी आया:
भारत माता: बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम’ लिखा और भारत माता की पहली छवि बनाई। बाद में अबनींद्रनाथ टैगोर ने इसे और भव्य रूप दिया।
लोक कथाएं: नटेसा शास्त्री जैसे विद्वानों ने लोक कथाओं को संकलित किया ताकि भारतीय अपनी संस्कृति पर गर्व कर सकें।
स्वराज्य ध्वज: गांधी जी ने 1921 में सफेद, हरा और लाल रंग का तिरंगा बनाया, जिसके बीच में ‘चरखा’ था।

अध्याय 1: यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय (The Rise of Nationalism in Europe) – Full Book Notes

फ्रेडरिक सॉरियू के सपनों का संसार


1848 में एक फ्रांसीसी कलाकार फ्रेडरिक सॉरियू ने चार चित्रों की एक श्रृंखला बनाई। इसमें उसने एक ऐसे संसार की कल्पना की जो ‘जनतांत्रिक और सामाजिक गणतंत्रों’ से मिलकर बना था।
चित्र की विशेषता: इस चित्र में यूरोप और अमेरिका के लोग एक लंबी कतार में स्वतंत्रता की मूर्ति (Statue of Liberty) की वंदना करते हुए जा रहे हैं।
मूर्ति के एक हाथ में ज्ञानोदय की मशाल है और दूसरे में मनुष्यों के अधिकारों का घोषणापत्र।

फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्र का विचार


राष्ट्रवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति 1789 में फ्रांसीसी क्रांति के साथ हुई। फ्रांसीसी क्रांतिकारियों ने सामूहिक पहचान की भावना पैदा करने के लिए कई कदम उठाए:
पितृभूमि (La Patrie) और नागरिक (Le Citoyen) जैसे विचारों पर जोर दिया गया।
एक नया फ्रांसीसी झंडा ‘तिरंगा’ चुना गया।
‘स्टेट्स जनरल’ का चुनाव सक्रिय नागरिकों द्वारा किया जाने लगा और उसका नाम बदलकर ‘नेशनल असेंबली’ कर दिया गया।
राष्ट्र के नाम पर नई स्तुतियां रची गईं और शपथें ली गईं।
एक केंद्रीय प्रशासनिक व्यवस्था लागू की गई जिसने समान कानून बनाए।

नेपोलियन की संहिता (1804)


जब नेपोलियन फ्रांस की सत्ता पर काबिज हुआ, तो उसने प्रजातंत्र को नष्ट कर दिया, लेकिन प्रशासनिक क्षेत्र में उसने क्रांतिकारी सुधार किए जिसे ‘नेपोलियन की संहिता’ कहा जाता है:
जन्म पर आधारित विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए।
कानून के सामने बराबरी और संपत्ति के अधिकार को सुरक्षित बनाया गया।
सामंती व्यवस्था को खत्म किया गया और किसानों को भू-दासत्व से मुक्ति दिलाई गई।
यातायात और संचार व्यवस्था में सुधार किया गया।

यूरोप में राष्ट्रवाद का निर्माण


18वीं सदी के मध्य में यूरोप में कोई ‘राष्ट्र-राज्य’ नहीं थे। जर्मनी, इटली और स्विट्जरलैंड कई छोटे-छोटे राज्यों और डचों में बंटे हुए थे।
कुलीन वर्ग: यह सामाजिक और राजनीतिक रूप से जमीन का मालिक और प्रभावशाली वर्ग था। ये आपस में शादियों के जरिए जुड़े हुए थे और फ्रेंच भाषा बोलते थे।
नया मध्यम वर्ग: औद्योगीकरण के कारण एक नया सामाजिक समूह उभरा जिसमें उद्योगपति, व्यापारी और सेवा क्षेत्र के लोग शामिल थे। इसी वर्ग ने सबसे पहले उदारवादी राष्ट्रवाद की मांग की।

उदारवादी राष्ट्रवाद के मायने


उदारवाद (Liberalism) का अर्थ था ‘आजाद’। मध्यम वर्ग के लिए इसका मतलब था:
राजनीतिक रूप से: ऐसी सरकार जो सबकी सहमति से बनी हो, संविधान और संसदीय प्रतिनिधि सरकार।
आर्थिक रूप से: बाजारों की मुक्ति और चीजों तथा पूंजी के आवागमन पर राज्य द्वारा लगाए गए नियंत्रणों को खत्म करना।
जोलवेराइन (Zollverein): 1834 में प्रशा की पहल पर एक शुल्क संघ ‘जोलवेराइन’ बनाया गया, जिसने व्यापारिक बाधाओं को खत्म किया और मुद्राओं (Currencies) की संख्या 30 से घटाकर 2 कर दी।

1815 के बाद एक नया रूढ़िवाद


1815 में नेपोलियन की हार के बाद, यूरोपीय सरकारें रूढ़िवाद (Conservatism) की भावना से प्रेरित थीं। वे चाहते थे कि राजतंत्र, चर्च और सामाजिक ऊंच-नीच बनी रहे।
वियना संधि (1815): ब्रिटेन, रूस, प्रशा और ऑस्ट्रिया के प्रतिनिधियों ने वियना में एक समझौता किया। इसका मुख्य उद्देश्य नेपोलियन द्वारा किए गए बदलावों को खत्म करना और राजतंत्र को बहाल करना था। फ्रांस की सीमाओं पर कई राज्य कायम कर दिए गए ताकि भविष्य में फ्रांस विस्तार न कर सके।

क्रांतिकारी और ज्युसेपे मेत्सिनी


रूढ़िवादी व्यवस्था के डर से कई उदारवादी राष्ट्रवादी जमीन के नीचे (Underground) चले गए और गुप्त संगठन बनाने लगे।
ज्युसेपे मेत्सिनी: यह इटली का महान क्रांतिकारी था। उसने दो गुप्त संगठन बनाए— ‘यंग इटली’ (मार्सेई में) और ‘यंग यूरोप’ (बर्न में)।
मेत्सिनी का मानना था कि ईश्वर की मर्जी के अनुसार राष्ट्र ही मनुष्यों की प्राकृतिक इकाई है। ऑस्ट्रिया के चांसलर मैटरनिख ने उसे ‘हमारी सामाजिक व्यवस्था का सबसे खतरनाक दुश्मन’ बताया था।

क्रांतियों का युग (1830-1848)


यूनानी स्वतंत्रता युद्ध: 1821 से शुरू हुआ। 1832 की कुस्तुनतुनिया की संधि ने यूनान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी।
रोमानीवाद (Romanticism): राष्ट्रवाद केवल युद्ध से नहीं आया। कवियों और कलाकारों ने लोक कथाओं, संगीत और भाषा के जरिए राष्ट्रीय भावना जगाई। पोलैंड में भाषा (पॉलिश) को रूसी कब्जे के खिलाफ हथियार बनाया गया।

जर्मनी और इटली का एकीकरण


जर्मनी का एकीकरण: प्रशा के मुख्यमंत्री ऑटो वॉन बिस्मार्क को इस प्रक्रिया का जनक माना जाता है। उसने ‘रक्त और लोहे’ की नीति अपनाई। सात वर्षों के दौरान तीन युद्धों (ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के साथ) के बाद 1871 में प्रशा के राजा विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित किया गया।
इटली का एकीकरण: इटली 7 राज्यों में बंटा था। इसके एकीकरण में तीन लोगों की मुख्य भूमिका थी— मेत्सिनी (दिल), कावूर (दिमाग) और गैरीबाल्डी (तलवार)। 1861 में इमानुएल द्वितीय को एकीकृत इटली का राजा घोषित किया गया।

राष्ट्र की दृश्य कल्पना


18वीं और 19वीं सदी में कलाकारों ने राष्ट्र को एक रूपक (Allegory) के रूप में चित्रित किया, जो अक्सर एक महिला आकृति होती थी।
फ्रांस में इसे ‘मरिआन’ कहा गया।
जर्मनी में इसे ‘जर्मेनिया’ कहा गया, जो बलूत के पत्तों का मुकुट पहनती है (जर्मन बलूत वीरता का प्रतीक है)।

अध्याय 3: भूमंडलीकृत विश्व का बनना (The Making of a Global World) – Full Digital Book

आधुनिक युग से पहले का विश्व


भूमंडलीकरण (Globalization) कोई नई घटना नहीं है। प्राचीन काल से ही यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री ज्ञान, अवसर और आध्यात्मिक शांति के लिए एक देश से दूसरे देश जाते रहे हैं। वे अपने साथ वस्तुएं, पैसा, मूल्य, मान्यताएं, हुनर, विचार, आविष्कार और यहाँ तक कि कीटाणु और बीमारियां भी ले गए।

रेशम मार्ग (Silk Routes) से जुड़ती दुनिया


प्राचीन काल में ‘रेशम मार्ग’ दुनिया के दूर-दराज के हिस्सों को आपस में जोड़ने वाले सबसे महत्वपूर्ण रास्ते थे।
व्यापार और संस्कृति: इन रास्तों से न केवल चीनी रेशम (Silk) बल्कि भारतीय मसाले, कपड़े और कीमती धातुएं (सोना-चांदी) यूरोप से एशिया आती थीं।
धर्म का प्रसार: ईसाई मिशनरी, मुस्लिम उपदेशक और बौद्ध धर्म भी इन्हीं रास्तों से होकर पूरी दुनिया में फैले।

भोजन की यात्रा: नूडल्स और आलू


हमारे खाद पदार्थ भी दुनिया के अलग-अलग कोनों से आए हैं:
नूडल्स: यह चीन से पश्चिम में गए और वहां ‘स्पैगेटी’ बन गए।
पास्ता: माना जाता है कि अरब यात्री पाँचवीं सदी में पास्ता लेकर सिसली (इटली) पहुंचे थे।
आलू और मक्का: हमारे आज के आम भोजन जैसे आलू, सोया, मूंगफली, मक्का, टमाटर और मिर्च पहले भारत में नहीं थे। ये ‘क्रिस्टोफर कोलंबस’ द्वारा अमेरिका की खोज के बाद यूरोप और एशिया पहुंचे।
आयरलैंड का अकाल: आलू आने के बाद वहां के गरीब लोग इतने निर्भर हो गए कि जब 1840 के दशक में आलू की फसल बीमारी से खराब हुई, तो लाखों लोग भुखमरी से मर गए (इसे ‘आयरिश आलू अकाल’ कहा जाता है)।

विजय, बीमारी और व्यापार


16वीं सदी में जब पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं ने अमेरिका पर विजय प्राप्त की, तो उन्होंने केवल हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया।
जैविक हथियार (कीटाणु): वे अपने साथ ‘चेचक’ (Smallpox) के कीटाणु ले गए। अमेरिका के लोग सदियों से दुनिया से अलग-थलग थे, इसलिए उनके शरीर में इन बीमारियों से लड़ने की क्षमता नहीं थी। चेचक ने वहां की पूरी की पूरी आबादी को खत्म कर दिया।

19वीं सदी का विश्व (1815-1914)


19वीं सदी में दुनिया के आर्थिक संबंधों में तीन तरह के ‘प्रवाह’ (Flows) देखे गए:
व्यापार का प्रवाह: मुख्य रूप से कपड़ों और गेहूं जैसे सामानों का व्यापार।
श्रम का प्रवाह: काम की तलाश में लोगों का एक देश से दूसरे देश जाना।
पूंजी का प्रवाह: कम या लंबी अवधि के लिए दूर-दराज के इलाकों में पैसा निवेश करना।

कॉर्न लॉ (Corn Laws) और वैश्विक कृषि


ब्रिटेन में बड़े भू-स्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का (Corn) के आयात पर पाबंदी लगा दी थी, जिसे ‘कॉर्न लॉ’ कहा गया।
परिणाम: जब यह कानून खत्म हुआ, तो बाहर से सस्ता खाना ब्रिटेन आने लगा। ब्रिटिश किसानों की हालत खराब हो गई और वे खेती छोड़कर शहरों या दूसरे देशों में चले गए। इससे दुनिया भर में खेती का स्वरूप बदल गया।

तकनीक की भूमिका


रेलवे, भाप के जहाज और टेलीग्राफ ने भूमंडलीकरण को तेज कर दिया।
रेफ्रिजरेशन (Refrigeration): जहाजों में रेफ्रिजरेशन तकनीक आने से अब जानवरों को जिंदा ले जाने के बजाय उनका मांस (Meat) ठंडा करके ले जाया जाने लगा। इससे मांस सस्ता हुआ और यूरोप के गरीबों तक भी पहुँचा।

रिंडरपेस्ट (Rinderpest) – मवेशी प्लेग


1890 के दशक में अफ्रीका में ‘रिंडरपेस्ट’ नाम की बीमारी फैली जिसने वहां के 90% पशुओं को मार दिया।
असर: अफ्रीकी लोग अपनी जमीन और मवेशियों पर निर्भर थे। पशुओं के मरने से उनकी आजीविका खत्म हो गई और उन्हें मजबूरन यूरोपीय औपनिवेशिक मालिकों के लिए खानों और बागानों में मजदूरी करनी पड़ी।

भारत से अनुबंधित श्रमिकों (Indentured Labour) का जाना


19वीं सदी में भारत और चीन से लाखों मजदूरों को बागानों, खानों और रेलवे निर्माण के लिए दुनिया भर में ले जाया गया।
इसे ‘नई दास प्रथा’ भी कहा गया। उन्हें फिजी, गयाना, त्रिनिदाद और मॉरीशस ले जाया गया।
सांस्कृतिक मेलजोल: त्रिनिदाद में ‘होसे’ (Hosey) नाम का मेला और कैरेबियन देशों में ‘चटनी म्यूजिक’ इसी मेलजोल का नतीजा है। भारत में 1921 में इस प्रथा को खत्म किया गया।

महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था


प्रथम विश्व युद्ध: यह दुनिया का पहला ‘औद्योगिक युद्ध’ था जिसमें मशीनगन, टैंक और हवाई जहाजों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ।
बड़े पैमाने पर उत्पादन: अमेरिका में ‘हेनरी फोर्ड’ ने असेंबली लाइन पद्धति शुरू की जिससे कारें (Model-T) सस्ती हुईं और उत्पादन बढ़ा।
महामंदी (The Great Depression – 1929): कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट और बैंकों के डूबने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई। भारत में भी गेहूं और जूट की कीमतें आधी रह गईं।

युद्ध के बाद का पुनर्निर्माण: ब्रेटन वुड्स संस्थान


युद्ध के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में ‘ब्रेटन वुड्स सम्मेलन’ हुआ।
इसमें दो मुख्य संस्थान बनाए गए: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank)। इन्हें ‘ब्रेटन वुड्स की जुड़वां संतान’ कहा जाता है।

अध्याय 3: भूमंडलीकृत विश्व का बनना (The Making of a Global World) – Full Digital Book

आधुनिक युग से पहले का विश्व


भूमंडलीकरण (Globalization) कोई नई घटना नहीं है। प्राचीन काल से ही यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री ज्ञान, अवसर और आध्यात्मिक शांति के लिए एक देश से दूसरे देश जाते रहे हैं। वे अपने साथ वस्तुएं, पैसा, मूल्य, मान्यताएं, हुनर, विचार, आविष्कार और यहाँ तक कि कीटाणु और बीमारियां भी ले गए।

रेशम मार्ग (Silk Routes) से जुड़ती दुनिया


प्राचीन काल में ‘रेशम मार्ग’ दुनिया के दूर-दराज के हिस्सों को आपस में जोड़ने वाले सबसे महत्वपूर्ण रास्ते थे।
व्यापार और संस्कृति: इन रास्तों से न केवल चीनी रेशम (Silk) बल्कि भारतीय मसाले, कपड़े और कीमती धातुएं (सोना-चांदी) यूरोप से एशिया आती थीं।
धर्म का प्रसार: ईसाई मिशनरी, मुस्लिम उपदेशक और बौद्ध धर्म भी इन्हीं रास्तों से होकर पूरी दुनिया में फैले।

भोजन की यात्रा: नूडल्स और आलू


हमारे खाद पदार्थ भी दुनिया के अलग-अलग कोनों से आए हैं:
नूडल्स: यह चीन से पश्चिम में गए और वहां ‘स्पैगेटी’ बन गए।
पास्ता: माना जाता है कि अरब यात्री पाँचवीं सदी में पास्ता लेकर सिसली (इटली) पहुंचे थे।
आलू और मक्का: हमारे आज के आम भोजन जैसे आलू, सोया, मूंगफली, मक्का, टमाटर और मिर्च पहले भारत में नहीं थे। ये ‘क्रिस्टोफर कोलंबस’ द्वारा अमेरिका की खोज के बाद यूरोप और एशिया पहुंचे।
आयरलैंड का अकाल: आलू आने के बाद वहां के गरीब लोग इतने निर्भर हो गए कि जब 1840 के दशक में आलू की फसल बीमारी से खराब हुई, तो लाखों लोग भुखमरी से मर गए (इसे ‘आयरिश आलू अकाल’ कहा जाता है)।

विजय, बीमारी और व्यापार


16वीं सदी में जब पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं ने अमेरिका पर विजय प्राप्त की, तो उन्होंने केवल हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया।
जैविक हथियार (कीटाणु): वे अपने साथ ‘चेचक’ (Smallpox) के कीटाणु ले गए। अमेरिका के लोग सदियों से दुनिया से अलग-थलग थे, इसलिए उनके शरीर में इन बीमारियों से लड़ने की क्षमता नहीं थी। चेचक ने वहां की पूरी की पूरी आबादी को खत्म कर दिया।

19वीं सदी का विश्व (1815-1914)


19वीं सदी में दुनिया के आर्थिक संबंधों में तीन तरह के ‘प्रवाह’ (Flows) देखे गए:
व्यापार का प्रवाह: मुख्य रूप से कपड़ों और गेहूं जैसे सामानों का व्यापार।
श्रम का प्रवाह: काम की तलाश में लोगों का एक देश से दूसरे देश जाना।
पूंजी का प्रवाह: कम या लंबी अवधि के लिए दूर-दराज के इलाकों में पैसा निवेश करना।

कॉर्न लॉ (Corn Laws) और वैश्विक कृषि


ब्रिटेन में बड़े भू-स्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का (Corn) के आयात पर पाबंदी लगा दी थी, जिसे ‘कॉर्न लॉ’ कहा गया।
परिणाम: जब यह कानून खत्म हुआ, तो बाहर से सस्ता खाना ब्रिटेन आने लगा। ब्रिटिश किसानों की हालत खराब हो गई और वे खेती छोड़कर शहरों या दूसरे देशों में चले गए। इससे दुनिया भर में खेती का स्वरूप बदल गया।

तकनीक की भूमिका


रेलवे, भाप के जहाज और टेलीग्राफ ने भूमंडलीकरण को तेज कर दिया।
रेफ्रिजरेशन (Refrigeration): जहाजों में रेफ्रिजरेशन तकनीक आने से अब जानवरों को जिंदा ले जाने के बजाय उनका मांस (Meat) ठंडा करके ले जाया जाने लगा। इससे मांस सस्ता हुआ और यूरोप के गरीबों तक भी पहुँचा।

रिंडरपेस्ट (Rinderpest) – मवेशी प्लेग


1890 के दशक में अफ्रीका में ‘रिंडरपेस्ट’ नाम की बीमारी फैली जिसने वहां के 90% पशुओं को मार दिया।
असर: अफ्रीकी लोग अपनी जमीन और मवेशियों पर निर्भर थे। पशुओं के मरने से उनकी आजीविका खत्म हो गई और उन्हें मजबूरन यूरोपीय औपनिवेशिक मालिकों के लिए खानों और बागानों में मजदूरी करनी पड़ी।

भारत से अनुबंधित श्रमिकों (Indentured Labour) का जाना


19वीं सदी में भारत और चीन से लाखों मजदूरों को बागानों, खानों और रेलवे निर्माण के लिए दुनिया भर में ले जाया गया।
इसे ‘नई दास प्रथा’ भी कहा गया। उन्हें फिजी, गयाना, त्रिनिदाद और मॉरीशस ले जाया गया।
सांस्कृतिक मेलजोल: त्रिनिदाद में ‘होसे’ (Hosey) नाम का मेला और कैरेबियन देशों में ‘चटनी म्यूजिक’ इसी मेलजोल का नतीजा है। भारत में 1921 में इस प्रथा को खत्म किया गया।

महायुद्धों के बीच अर्थव्यवस्था


प्रथम विश्व युद्ध: यह दुनिया का पहला ‘औद्योगिक युद्ध’ था जिसमें मशीनगन, टैंक और हवाई जहाजों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ।
बड़े पैमाने पर उत्पादन: अमेरिका में ‘हेनरी फोर्ड’ ने असेंबली लाइन पद्धति शुरू की जिससे कारें (Model-T) सस्ती हुईं और उत्पादन बढ़ा।
महामंदी (The Great Depression – 1929): कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट और बैंकों के डूबने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई। भारत में भी गेहूं और जूट की कीमतें आधी रह गईं।

युद्ध के बाद का पुनर्निर्माण: ब्रेटन वुड्स संस्थान


युद्ध के बाद दुनिया की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में ‘ब्रेटन वुड्स सम्मेलन’ हुआ।
इसमें दो मुख्य संस्थान बनाए गए: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank)। इन्हें ‘ब्रेटन वुड्स की जुड़वां संतान’ कहा जाता है।

अध्याय 4: औद्योगीकरण का युग (The Age of Industrialisation) – Full Digital Book Notes

औद्योगिक क्रांति से पहले का समय


अक्सर हम औद्योगीकरण का मतलब ‘फैक्ट्रियों के लगने’ से जोड़ते हैं, लेकिन फैक्ट्रियों से पहले भी अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। इसे ‘आदि-औद्योगीकरण’ (Proto-industrialisation) कहा जाता है।
इस समय उत्पादन कारखानों में नहीं बल्कि घरों में होता था।
व्यापारी गांवों में किसानों को पैसा देते थे और उनसे सामान तैयार करवाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचते थे।

कारखानों का उदय


इंग्लैंड में सबसे पहले 1730 के दशक में कारखाने खुले। कपास (Cotton) इस नए युग का पहला प्रतीक था।
रिचर्ड आर्कराइट: इन्होंने सूती मिल की रूपरेखा रखी। अब सारी प्रक्रिया एक ही छत के नीचे और मशीनों के जरिए होने लगी।
बदलाव की रफ्तार: शुरुआत में कपास और फिर लोहा और स्टील उद्योग सबसे तेजी से बढ़े। लेकिन मशीनीकरण के बावजूद, पारंपरिक हाथ से काम करने वाले उद्योग पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे।

हाथ का श्रम और वाष्प शक्ति


विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मानव श्रम (मजदूरों) की कोई कमी नहीं थी। इसलिए उद्योगपति मशीनों में ज्यादा पैसा नहीं लगाना चाहते थे क्योंकि:
मशीनें बहुत महंगी थीं और खराब होने पर उनकी मरम्मत में बहुत खर्चा आता था।
बहुत सारे उत्पाद (जैसे डिजाइन वाले कपड़े) मशीनों से नहीं, केवल हाथ से ही बनाए जा सकते थे।
विक्टोरियाई उच्च वर्ग हाथ से बनी चीजों को ‘परिष्कृत’ और ‘शानदार’ मानता था।

मजदूरों का जीवन


बाजार में मजदूरों की बहुतायत की वजह से नौकरियां मिलना मुश्किल था।
बेरोजगारी का डर: जब स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) जैसी मशीनें आईं, तो महिलाओं ने उन पर हमला कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि ये मशीनें उनका काम छीन लेंगी।
मजदूरों को काम मिलने के लिए सामाजिक संपर्क (रिश्तेदारी) पर निर्भर रहना पड़ता था। बहुत से मजदूरों को साल के कुछ ही महीने काम मिलता था।

भारत के कपड़ा उद्योग का इतिहास


मशीनी उद्योगों से पहले, अंतरराष्ट्रीय कपड़ा बाजार में भारत के रेशमी और सूती माल का दबदबा था।
सूरत, मसूलीपट्टनम और हुगली मुख्य बंदरगाह थे।
भारत का ‘मलमल’ और बारीक कपड़ा पूरी दुनिया में मशहूर था।

बुनकरों पर क्या असर पड़ा?


जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपनी सत्ता जमा ली, तो उन्होंने भारतीय बुनकरों पर नियंत्रण करने के लिए ‘गुमाश्ता’ (Gomastha) नियुक्त किए।
गुमाश्ता कौन थे? ये कंपनी के वेतनभोगी कर्मचारी थे जो बुनकरों को कर्ज देते थे और माल इकट्ठा करते थे।
कर्ज का जाल: कर्ज लेने के बाद बुनकर अपना माल किसी और को नहीं बेच सकते थे। धीरे-धीरे बुनकरों और गुमाश्तों के बीच टकराव बढ़ने लगा और कई बुनकर खेती की तरफ लौट गए।

भारत में मैनचेस्टर का आगमन


19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन के कपड़ा उद्योगपतियों ने सरकार पर दबाव डाला कि वह भारतीय कपड़े पर आयात शुल्क लगाए ताकि मैनचेस्टर में बना कपड़ा भारत में बिक सके।
समस्या: भारतीय बुनकरों के सामने दोहरी समस्या थी—उनका निर्यात बाजार खत्म हो गया और स्थानीय बाजार मैनचेस्टर के सस्ते मशीनी कपड़ों से भर गया।
ऊपर से अमेरिका के गृहयुद्ध के कारण भारत से कच्चे कपास का निर्यात बढ़ गया, जिससे भारतीय बुनकरों को कच्चा माल भी महंगा मिलने लगा।

भारत में फैक्ट्रियों की शुरुआत


भारत की पहली सूती मिल 1854 में बंबई (मुंबई) में लगी।
इसके बाद बंगाल में जूट मिलें और कानपुर में ‘एल्गिन मिल’ खुली।
प्रमुख उद्यमी: द्वारकानाथ टैगोर, जमशेदजी नसरवानजी टाटा और सेठ हुकुमचंद जैसे लोगों ने भारत में उद्योगों की नींव रखी।

औद्योगिक विकास की अनोखी बातें


पहले विश्व युद्ध तक भारत के औद्योगिक विकास की रफ्तार धीमी थी। लेकिन युद्ध ने सब बदल दिया:
युद्ध के दौरान मैनचेस्टर से माल आना बंद हो गया, जिससे भारतीय मिलों को घरेलू बाजार मिल गया।
भारतीय मिलों को फौज के लिए वर्दी, टेंट और जूते बनाने के ऑर्डर मिलने लगे।
युद्ध के बाद ब्रिटेन कभी भी भारतीय बाजार में अपनी पुरानी साख वापस नहीं पा सका।

वस्तुओं के लिए बाजार और विज्ञापन


उद्योगपतियों ने अपना माल बेचने के लिए विज्ञापनों का सहारा लिया।
वे कैलेंडर और लेबल पर भारतीय देवी-देवताओं (जैसे सरस्वती, लक्ष्मी) की तस्वीरें लगाते थे ताकि लोगों को सामान अपना सा लगे।
‘मेड इन मैनचेस्टर’ के लेबल भरोसे का प्रतीक माने जाते थे।
बाद में भारतीय राष्ट्रवादियों ने विज्ञापन के जरिए ‘स्वदेशी’ का संदेश फैलाया।

अध्याय 5: मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया (Print Culture and the Modern World) – Full Digital Book Notes

मुद्रण की शुरुआत: चीन, जापान और कोरिया


छपाई की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई थी। यह छपाई हाथ से होती थी।
चीन: यहाँ लकड़ी के ब्लॉक (Block Printing) से कागज पर रगड़कर छपाई की जाती थी। चीन के पास एक विशाल प्रशासनिक तंत्र था, जिसकी परीक्षाओं के लिए बड़ी मात्रा में किताबें छापी जाती थीं।
जापान: चीनी बौद्ध प्रचारक 768-770 ईस्वी के आसपास छपाई की तकनीक जापान ले गए। जापान की सबसे पुरानी छपी पुस्तक ‘डायमंड सूत्र’ (868 ई.) है।

यूरोप में प्रिंट का आगमन


सदियों तक रेशम और मसाले के साथ-साथ कागज भी ‘सिल्क रूट’ के जरिए यूरोप पहुँचता रहा।
मार्को पोलो: 1295 में महान खोजी यात्री मार्को पोलो चीन से वापस इटली लौटा और अपने साथ लकड़ी के ब्लॉक (Woodblock) वाली छपाई की तकनीक ले गया।
धीरे-धीरे हाथ से लिखी जाने वाली ‘पांडुलिपियों’ (Manuscripts) की जगह छपी हुई किताबों ने ले ली।

गुटेनबर्ग और प्रिंटिंग प्रेस


छपाई के क्षेत्र में असली क्रांति योहान गुटेनबर्ग ने की। उसने 1430 के दशक में पहली प्रिंटिंग प्रेस बनाई।
गुटेनबर्ग ने जैतून (Olive) पेरने वाली मशीन के आधार पर अपनी प्रेस का मॉडल तैयार किया।
उसने धातुओं के अक्षर (Moveable Type) बनाए।
गुटेनबर्ग प्रेस से छपने वाली पहली किताब ‘बाइबिल’ थी। इसकी 180 प्रतियां छापने में 3 साल लगे थे, जो उस समय के हिसाब से बहुत तेज था।

मुद्रण क्रांति और उसका असर


छापेखाने के आने से न केवल किताबों की संख्या बढ़ी, बल्कि लोगों का जीवन भी बदल गया:
नया पाठक वर्ग: किताबें सस्ती होने से अब आम लोग भी इन्हें खरीदने लगे। साक्षरता दर (Literacy Rate) बढ़ने लगी।
धार्मिक बहस: छपे हुए विचारों के कारण धर्म पर बहस शुरू हुई। मार्टिन लूथर ने रोमन कैथोलिक चर्च की कुरीतियों के खिलाफ ’95 स्थापनाएं’ लिखीं, जिससे ‘प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार’ आंदोलन शुरू हुआ।

पढ़ने का उन्माद (The Reading Mania)


17वीं और 18वीं सदी तक यूरोप के चर्चों ने गांवों में स्कूल खोले, जिससे किसान और कारीगर भी पढ़ने लगे।
सस्ती किताबें: इंग्लैंड में ‘पेनी चैपबुक्स’ (एक पैसे वाली किताबें) और फ्रांस में ‘बिब्लियोथिक ब्लू’ जैसी सस्ती किताबें बेची जाने लगीं।
वैज्ञानिकों (जैसे न्यूटन) और दार्शनिकों (जैसे वॉल्टेयर, रूसो) के विचार आम जनता तक पहुँचने लगे, जिससे समाज में तार्किक सोच पैदा हुई।

भारत में मुद्रण संसार


भारत में छपाई की तकनीक सबसे पहले 16वीं सदी में पुर्तगाली धर्मप्रचारक गोवा लेकर आए थे।
कोंकणी और कन्नड़: जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में कई पुस्तकें छापीं।
जेम्स ऑगस्टस हिक्की: 1780 से इन्होंने ‘बंगाल गजट’ नाम की एक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया, जो किसी भी भारतीय द्वारा निकाला गया पहला अखबार था।

धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहस


19वीं सदी की शुरुआत से ही भारत में सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर बहस छिड़ गई थी।
राजा राममोहन राय: उन्होंने 1821 में ‘संवाद कौमुदी’ का प्रकाशन किया।
रूढ़िवादी हिंदू: उन्होंने राममोहन राय के विचारों के खिलाफ ‘समाचार चंद्रिका’ निकाली।
इस्लाम: देवबंद उलेमा ने फतवे जारी किए ताकि मुसलमान अपनी जीवनशैली को सुरक्षित रख सकें।

प्रकाशन के नए रूप


जैसे-जैसे पाठक बढ़े, लिखने के नए तरीके भी आए:
उपन्यास (Novel): लोगों को उपन्यासों में अपनी जिंदगी और भावनाएं दिखने लगीं।
महिलाएं और प्रिंट: कई महिलाओं ने अपनी जिंदगी के अनुभवों पर किताबें लिखीं। जैसे रशसुंदरी देवी ने अपनी आत्मकथा ‘आमार जीबन’ (1876) लिखी। यह बंगाली भाषा में लिखी गई पहली आत्मकथा थी।
कैलाशबाशिनी देवी ने महिलाओं की दयनीय स्थिति पर लिखा।

गरीब पाठक और प्रिंट


19वीं सदी के मद्रास में सस्ती किताबें चौराहों पर बेची जाने लगीं।
जाति भेद: ज्योतिबा फुले ने अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ (1871) में जाति व्यवस्था के अन्याय पर लिखा।
मजदूर: कानपुर के मिल मजदूर काशीबाबा ने ‘छोटे और बड़े का सवाल’ लिखकर वर्ग भेद को उजागर किया।

प्रिंट और सेंसरशिप


शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी प्रेस पर पाबंदी नहीं लगाती थी, लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों का रवैया बदल गया।
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट (1878): आयरिश प्रेस कानून के आधार पर यह कानून बना। इसने सरकार को भारतीय भाषाओं के अखबारों को सेंसर करने का अधिकार दे दिया।
अगर किसी अखबार में ‘राजद्रोही’ खबर छपती थी, तो पहले चेतावनी दी जाती थी और फिर उसकी मशीनें जब्त कर ली जाती थीं।
बाल गंगाधर तिलक ने अपने अखबार ‘केसरी’ में राष्ट्रवाद का प्रचार किया, जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

About the Author – Deepak Kumar


Hi, main Deepak Kumar hoon. Maine GNM, Post BSc Nursing, aur MSc Nursing ki hai. Ek experienced ICU Nursing Officer hone ke naate, main Bexyhub par nursing students ke liye original aur practical notes share karta hoon taaki aap clinical practice aur exams mein excel kar sakein.


महत्वपूर्ण सूचना (Disclaimer):
यह पोस्ट केवल शैक्षिक उद्देश्यों (Educational Purposes) के लिए साझा की गई है। यहाँ दी गई जानकारी मेरे नर्सिंग अनुभव और अध्ययन पर आधारित है। यदि आपको किसी जानकारी पर संदेह है या कोई शिकायत है, तो कृपया कमेंट बॉक्स में बताएं या हमसे संपर्क करें। किसी भी चिकित्सीय निर्णय के लिए पेशेवर डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

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